रिम्स और डीआईजी ग्राउंड में सरकारी लापरवाही: अपार्टमेंट मालिकों की जिंदगी उजड़ने का मामला, सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल

सरकारी लापरवाही
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सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही और आपसी तालमेल की कमी ने रिम्स डीआईजी ग्राउंड स्थित एक ही अपार्टमेंट के 16 परिवारों सहित अन्य आठ घरों के परिवारों की जिंदगी उलट-पुलट कर रख दी है। जिन लोगों ने जीवन भर की कमाई, बैंक कर्ज और भविष्य के सपनों के सहारे फ्लैट खरीदे थे, वे अब सड़क पर आ खड़े हैं। जमीन विवादित थी, यह तर्क प्रशासन दे रहा है, लेकिन जिस जमीन पर अपार्टमेंट बना, उसी जमीन का नक्शा पास हुआ, म्यूटेशन हुआ, रेरा से प्रमाणपत्र मिला और बैंकों ने होम लोन तक दे दिया। अब उसी इमारत पर बुलडोजर चल रहा है। सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण हटाया जाए या नहीं, सवाल यह है कि सरकारी गलती की सजा आम लोगों को क्यों भुगतनी पड़ रही है। रिम्स के साउथ ब्लाक में बने आनंदम अपार्टमेंट को तोड़ने की कार्रवाई ने पूरे सिस्टम की परतें खोल दी हैं। करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से बने इस चार तल्ले अपार्टमेंट में कुल 20 फ्लैट थे, जिनमें से 16 फ्लैट बिक चुके थे। हर फ्लैट पर 65 से 80 लाख रुपये तक खर्च हुए, जबकि इंटीरियर पर अलग से 15 से 20 लाख रुपये लगाए गए. अब कुछ सप्ताह में यह इमारत मलबे में तब्दील होने वाली है। फ्लैट मालिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन विवादित थी, तो फिर इतने वर्षों तक सरकारी विभाग आंख मूंदे क्यों बैठे रहे।सबसे गंभीर पहलू यह भी है कि जिस जमीन पर अपार्टमेंट बना, वह पहले से ही विवादित थी। कोर्ट में मामला चल रहा था। इसके बावजूद बिल्डर ने निर्माण कार्य नहीं रोका। रिम्स के तत्कालीन संपदा पदाधिकारी की ओर से बिल्डर को लगातार नोटिस दिए गए, लेकिन निर्माण चलता रहा। हैरानी की बात यह भी है कि विवाद के बावजूद नगर निगम ने भवन का नक्शा पास कर दिया। अंचल कार्यालय ने म्यूटेशन कर दिया और रेरा ने परियोजना को प्रमाणपत्र दे दिया। इतना ही नहीं, बैंकों ने भी सभी दस्तावेज जांचने के बाद फ्लैट खरीदारों को होम लोन स्वीकृत कर दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किस स्तर पर चूक हुई। अगर जमीन रिम्स द्वारा अधिग्रहण किया गया था तो रजिस्ट्रार ने रजिस्ट्री कैसे कर दी। अगर रजिस्ट्री गलत थी तो म्यूटेशन कैसे हो गया और अगर सब गलत था तो बैंकों ने करोड़ों रुपये का लोन किस आधार पर दे दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा करना भी अब जोखिम भरा हो गया है। यह वो दस्तावेज हैं जो सरकार इस भरोसे के साथ देती है कि वे चैन से रह सकें।डीआईजी ग्राउंड के पास हुई कार्रवाई ने भी सरकारी व्यवस्था की पोल खोल दी है। यहां रिम्स के पूर्व चिकित्सक डॉ. आईडी चौधरी का दो मंजिला मकान बुलडोजर से तोड़ दिया गया। उनका कहना है कि उनकी जमीन रैयती है और वर्ष 2004 में उसका विधिवत म्यूटेशन हो चुका था। पिछले 20 वर्षों से वे जमीन का टैक्स भी भरते रहे और इतने लंबे समय तक किसी विभाग ने आपत्ति नहीं की, लेकिन अब अचानक उसी जमीन का दोबारा म्यूटेशन कर दिया गया और उसे रिम्स की जमीन बताया जा रहा है। यह सवाल उठ रहा है कि एक ही जमीन का दो बार म्यूटेशन कैसे संभव हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों तक सरकार ने उनसे टैक्स वसूला और अब उसी जमीन को अतिक्रमण बताकर घर तोड़ दिए जा रहे हैं। लोगों के अनुसार, अगर जमीन गलत थी तो 20 साल पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई। अब जब मकान बन गए, परिवार बस गए और बैंक कर्ज ले लिया गया, तब बुलडोजर चलाना कहां तक न्यायसंगत है।कार्रवाई के दौरान मानवीय पहलू भी सामने आया। किसी के बच्चे का स्कूल छूट गया, तो कोई गर्भवती महिला बेघर हो गई। कई परिवार टूटे हुए मकानों से अपना जरूरी सामान निकालते नजर आए। आंखों में आंसू और चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी।लोगों का कहना है कि वे अदालत का सम्मान करते हैं, लेकिन सरकारी गलती का खामियाजा उन्हें क्यों भुगतना पड़ रहा है। फ्लैट मालिकों का आरोप है कि प्रशासन न्यायालय में गलत और अधूरी जानकारी देकर कार्रवाई कर रहा है। वे बार-बार अपने दस्तावेज दिखा रहे हैं, लेकिन कोई अधिकारी यह बताने को तैयार नहीं कि गलती किसकी है। अधिकारी सिर्फ आदेश का हवाला देकर कार्रवाई कर रहे हैं।इस कार्रवाई से 16 फ्लैट मालिकों की करोड़ों रुपये की पूंजी डूब चुकी है। कई परिवारों ने अपनी पूरी जमापूंजी, रिटायरमेंट फंड और कर्ज लगाकर फ्लैट खरीदा था। अब उनके सामने न तो रहने की जगह है और न ही बैंक लोन चुकाने का कोई रास्ता दिख रहा है। फ्लैट मालिकों का सवाल है कि जब बैंकों ने दस्तावेजों की जांच कर लोन दिया, तो अब वे ईएमआई कैसे भरें। अपार्टमेंट टूट जाएगा, लेकिन कर्ज चलता रहेगा।इतना ही नहीं एक फ्लैट मालिक ने बताया कि उन्होंने पिता की पूरी रिटायरमेंट की रकम और अपनी बचत जोड़कर करीब 80 लाख रुपये का फ्लैट खरीदा था। भावुक होकर उन्होंने कहा कि अब पिता को क्या जवाब देंगे। दूसरे मामले में एक महिला ने बताया कि 86 लाख रुपये खर्च कर उन्होंने घर खरीदा, जो उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी थी। अब घर टूट जाएगा, लेकिन बैंक की किस्तें नहीं रुकेंगी। एक अन्य फ्लैट मालिक दिनेश कुमार सिंह का कहना है कि अंचल कार्यालय, नगर निगम, रेरा और बैंक, सभी ने जमीन और परियोजना को सही बताया था। ऐसे में उन्होंने कहां गलती की। अब बिल्डर गायब है और कर्ज का बोझ उनके सिर पर है।

डीआईजी ग्राउंड के पास रहने वाले कुंजन किडो कहते है कि जब वर्षों तक जमीन का टैक्स लिया गया और म्यूटेशन किया गया, तो अब अतिक्रमण कैसे हो गया। अगर दस्तावेज गलत हैं तो उन अधिकारियों को गिरफ्तार किया जाए, जिनकी वजह से लोगों की पूरी जिंदगी की कमाई बर्बाद हो गई।अब इस पूरे मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की गहरी लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार का मामला है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन सिर्फ इमारतें तोड़कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा।

पीड़ित परिवारों की मांग है कि दोषी अधिकारियों, बिल्डर और जमीन मालिकों पर सख्त कार्रवाई हो, पीड़ितों को मुआवजा मिले और बैंक लोन पर तत्काल राहत दी जाए। रिम्स और डीआईजी ग्राउंड की कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर सरकारी दस्तावेज, रजिस्ट्री, म्यूटेशन और बैंक लोन भी सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी आखिर किस पर भरोसा करे। यह मामला सिर्फ रिम्स में हुए अतिक्रमण का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का बन गया है।

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Author: kelanchaltimes

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