इंटरनेशनल सेक्स स्कैण्डल की आंच अब दिल्ली तक! जेफरी एपस्टीन और हरदीप सिंह पुरी के बीच ‘सीक्रेट डील’ का सनसनीखेज खुलासा

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नई दिल्ली: दुनिया के सबसे कुख्यात सेक्स अपराधी जेफरी एपस्टीन (Jeffrey Epstein) और भारत के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बीच कथित संबंधों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। एपस्टीन की हालिया लीक हुई फाइल्स ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है। दावा किया जा रहा है कि 2014 में हरदीप सिंह पुरी ने एक सजायाफ्ता अपराधी को ‘स्पेशल फेवर’ दिया था।

2014 का वो ‘वीजा’ कनेक्शन

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला साल 2014 का है जब हरदीप सिंह पुरी भारतीय विदेश सेवा (IFS) से रिटायर होने के बाद बीजेपी में शामिल हुए थे। दस्तावेजों में दावा किया गया है कि:

* वीजा के लिए सीधी मदद: एपस्टीन ने अपनी असिस्टेंट को भारतीय वीजा जल्द दिलाने के लिए पुरी से सीधे संपर्क साधा था।

* डिप्लोमैटिक चैनल्स का उपयोग: आरोप है कि पुरी ने अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल कर इस काम को ‘प्रायोरिटी’ पर करवाया, जिससे वीजा मिलने की प्रक्रिया तेज हो गई।

मैनहट्टन मुलाकात और ‘एक्सोटिक आइलैंड’ का जिक्र

लीक हुए ईमेल्स और मैसेजेस से यह संकेत मिलता है कि यह रिश्ता केवल एक वीजा तक सीमित नहीं था। खुलासे में बताया गया है कि:

* मुलाकातें: 2014 से 2017 के बीच दोनों के बीच लगातार बातचीत हुई। पुरी ने न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में एपस्टीन के आलीशान घर पर कम से कम तीन बार मुलाकात की।

* विवादास्पद मैसेज: एक मैसेज में पुरी ने कथित तौर पर लिखा, “जब तुम अपने एक्सोटिक आइलैंड (Exotic Island) से वापस आओ, तब मिलते हैं।” गौर करने वाली बात यह है कि एपस्टीन का यही आइलैंड उसके सेक्स स्कैंडल का मुख्य केंद्र था।

विपक्ष हमलावर: महुआ मोइत्रा ने दागे सवाल

इस खुलासे के बाद देश में सियासी घमासान शुरू हो गया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर स्क्रीनशॉट्स साझा करते हुए केंद्र सरकार को घेरा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक सजायाफ्ता अपराधी को डिप्लोमैटिक मदद देना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता नहीं है?

कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। विपक्ष का तर्क है कि नैतिकता के आधार पर एक केंद्रीय मंत्री के ऐसे संदिग्ध व्यक्ति से संबंध देश की छवि खराब करते हैं।

सरकार और सूत्रों का पक्ष

वहीं, दूसरी ओर सरकारी सूत्रों और करीबियों का कहना है कि ये आरोप निराधार हैं। उनका तर्क है कि:

* यह केवल ‘प्रोफेशनल नेटवर्किंग’ का हिस्सा था।

* डिप्लोमैटिक करियर के दौरान कई लोगों से संवाद होता है, जिसे गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है।

* इसे महज ‘नाम ड्रॉपिंग’ (Name Dropping) का मामला बताया जा रहा है। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वाकई महज एक बिजनेस नेटवर्किंग थी या इसके पीछे कोई गहरी कहानी छिपी है? क्या सरकार इन आरोपों पर कोई आंतरिक जांच बिठाएगी या इसे राजनीतिक षड्यंत्र मानकर खारिज कर दिया जाएगा।

 

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Author: gaytri

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