मन की मलीनता दूर होने से ही संभव है जीव का कल्याण: स्वामी दयानंद

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बसंतराय (गोड्डा): प्रखंड के महेशपुर गांव स्थित समुद्राबांध सत्संग मंदिर परिसर में आयोजित दो दिवसीय संतमत सत्संग के 38वें वार्षिक अधिवेशन का समापन बुधवार को आध्यात्मिक चर्चा के साथ हुआ। इस अवसर पर महर्षि मेंहीं धाम (मनियारपुर, बौसी) से पधारे स्वामी दयानंद जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जीवन में सात्विकता और भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला।

स्वामी दयानंद जी ने कहा कि जीव ईश्वर का ही अंश है, लेकिन ईश्वर की प्राप्ति तभी संभव है जब प्रभु के चरणों में सच्ची लगन हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि परमात्मा के नाम का निरंतर जप और ध्यान करने की आदत डालनी चाहिए। मन की गंदगी और मलीनता केवल ज्ञानोदय (ज्ञान के उदय) से ही साफ हो सकती है। आध्यात्मिक मार्ग पर सद्गुरु सर्वोपरि हैं, उनके चरणों की सेवा पूरी श्रद्धा से करनी चाहिए।

प्रवचन के दौरान महाराज जी ने व्यवहारिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण सूत्र दिए:

“मधुर वचन औषधि के समान होते हैं। मनुष्य को हमेशा सोच-समझकर और माप-तौल कर ही बोलना चाहिए। वचन में पवित्रता, गलत संगति से दूरी और खान-पान में शुद्धता ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

उन्होंने कहा कि संत समाज जीव मात्र के प्रति दया और ममता का भाव रखता है। संतों का लक्ष्य भारत माता के बोझ को हल्का करना और सनातन सभ्यता, संस्कृति व धर्म की रक्षा करना है। उन्होंने श्रद्धालुओं को मानस जप और मंत्र जप को हृदय में धारण करने की प्रेरणा दी।

इस वार्षिक अधिवेशन में स्वामी उत्तमानंद जी महाराज, अनुपम बाबा, सच्चिदानंद जी महाराज, भवेशानंद जी महाराज, सूर्यानंद स्वामी समेत कई विद्वान संतों ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का सफल संचालन और धन्यवाद ज्ञापन आश्रम के व्यवस्थापक संत घनश्याम बाबा द्वारा किया गया। इस दो दिवसीय सत्संग में आसपास के क्षेत्रों से आए भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

 

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Author: gaytri

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