पैनम कोल माइंस अवैध खनन मामला में अदालत ने दिखाई सख्ती, सरकार से दो दिन में मांगा जवाब, नहीं देने पर होगी अवमानना की कार्रवाई

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रांची। झारखंड हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने पैनम कोल माइंस में अवैध खनन को लेकर दायर जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से अब तक कानूनी कार्रवाई की जानकारी नहीं देने पर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने दो टूक कहा कि यदि आदेश का अनुपालन नहीं किया गया तो अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी। इस मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को निर्धारित की गई है। यह जनहित याचिका रामसुभग सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि पाकुड़ जिले के पचवारा नार्थ और सेंट्रल कोल माइंस में पैनम कंपनी द्वारा तय सीमा से अधिक कोयला खनन किया गया है। याचिका में बताया गया कि इस अवैध खनन के विरुद्ध वर्ष 2015 में याचिका दायर की गई थी। राज्य सरकार की ओर से पूर्व में बताया गया था कि कंपनी ने खनन में अनियमितताएं की हैं और अब वह कंपनी वहां से हट चुकी है। वर्ष 2017 में तत्कालीन खान सचिव सुनील कुमार वर्णवाल ने शपथपत्र दाखिल कर यह स्वीकार किया था कि कंपनी ने अवैध खनन किया और विस्थापित लोगों के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। हालांकि, अदालत में यह भी प्रस्तुत किया गया कि राज्य सरकार ने कंपनी के खिलाफ अब तक कोई विधिक कार्रवाई नहीं की, जो कि गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में गंभीरता बरती जाए और आगामी दो दिनों में पूरे तथ्यों के साथ जानकारी पेश की जाए। राज्य सरकार स्वयं कोर्ट में यह स्वीकार कर चुकी है कि पैनम कंपनी ने खनन में गड़बड़ियां की हैं, फिर भी आज तक कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। कंपनी द्वारा किए गए अवैध खनन से स्थानीय आदिवासी एवं ग्रामीण प्रभावित हुए, जिनके लिए पुनर्वास या मुआवजा जैसी कोई भी योजना लागू नहीं की गई। यह संविधान प्रदत्त अधिकारों का भी उल्लंघन है। दरअसल यह है की पाकुड़ जिले के पचवारा नार्थ और सेंट्रल ब्लॉक में पैनम कोल माइंस द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक खनन किया गया। मामले को लेकर हाई कोर्ट में लबित है झारखंड सरकार की जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और विस्थापितों के अधिकारों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक खनन अनियमितता का नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, स्थानीय समुदायों की उपेक्षा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार अदालत के निर्देशों का कितना सम्मान करती है और क्या वह दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई करती है या नहीं।

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