कदवा (कटिहार): बिहार के कटिहार जिले के कदवा प्रखंड स्थित दुर्गागंज का ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की पुरानी जमींदारी व्यवस्था की विरासत को भी संजोए हुए है। करीब 115 साल पुराने इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1908 में मालद्वार स्टेट के राजपरिवार द्वारा दान में दी गई जमीन पर की गई थी। शुरुआत में मंदिर में दुर्गा पूजा का पूरा खर्च दुर्गागंज स्टेट का राजपरिवार ही उठाता था। वर्ष 2002 में मंदिर को सार्वजनिक कर दिया गया, जिसके बाद श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार मंदिर के लिए दान देने लगे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मंदिर में दुर्गा पूजा की परंपरा राजपरिवार के समय से चली आ रही विशेष पूजा-विधियों के साथ आज भी निभाई जाती है। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान यहां भव्य आयोजन और मेले का आयोजन होता है। अष्टमी और नवमी के दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। पुष्पांजलि, संध्या आरती और दीप प्रज्वलन के समय बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। गांव के वैसे लोग, जो रोजगार या अन्य कारणों से बाहर रहते हैं, वे भी पूजा के अवसर पर गांव लौटकर अपनी भागीदारी निभाते हैं।
दुर्गागंज के इस मंदिर को लेकर स्थानीय श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। लोगों का मानना है कि सच्चे मन से मां दुर्गा से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। मान्यता के अनुसार, मन्नत पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु सोने के आभूषण भी चढ़ाते हैं। मंदिर में मिठाई के अलावा छागर की बलि चढ़ाने की परंपरा भी बताई जाती है। अष्टमी और नवमी के अवसर पर मन्नत से जुड़े प्रसाद के लिए श्रद्धालुओं को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। इस तरह दुर्गागंज का दुर्गा मंदिर आज भी धार्मिक आस्था, सामुदायिक सहयोग और क्षेत्र के ऐतिहासिक गौरव का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।



