प्रवीण कुमार, कटिहार। बिहार के कटिहार जिले के कदवा प्रखंड स्थित दुर्गागंज का सार्वजनिक दुर्गा मंदिर ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। करीब 115 वर्ष पुराने इस मंदिर का इतिहास दुर्गागंज स्टेट और मालद्वार स्टेट के राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1908 में राजपरिवार द्वारा दान में दी गई जमीन पर मंदिर का निर्माण कराया गया था। उस समय दुर्गा पूजा की पूरी व्यवस्था और खर्च राजपरिवार ही उठाता था। आज भी यहां राजपरिवार के समय से चली आ रही विशेष तांत्रिक विधि से पूजा-अर्चना की परंपरा कायम है।
2002 में सार्वजनिक हुआ मंदिर, गांव के लोग मिलकर उठाते हैं पूजा का खर्च
दुर्गागंज स्थित इस ऐतिहासिक मंदिर को वर्ष 2002 में सार्वजनिक कर दिया गया। इसके बाद श्रद्धालु अपनी इच्छानुसार मंदिर के लिए चंदा और दान देने लगे। हालांकि, आज भी दुर्गागंज गांव के परिवार पूजा के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गांव के कई लोग बाहर रहते हुए भी अपनी कमाई से मां दुर्गा की पूजा के लिए सहयोग भेजते हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान गांव से बाहर रहने वाले लोग भी समय निकालकर पूजा में शामिल होने पहुंचते हैं। मंदिर की परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व के कारण स्थानीय लोगों के बीच इसकी विशेष पहचान है।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं सोने के आभूषण, अष्टमी-नवमी को उमड़ती है भीड़
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, दुर्गागंज दुर्गा मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होने की मान्यता है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त मां दुर्गा को सोने के आभूषण सहित विभिन्न वस्तुएं चढ़ाते हैं। यहां मिठाई के साथ छागर की बलि देने की परंपरा भी बताई जाती है। विशेष रूप से महाष्टमी और महानवमी के दिन पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मन्नत से जुड़े प्रसाद के लिए भक्तों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। पुष्पांजलि, संध्या आरती और दीप प्रज्वलन के समय मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। शारदीय दुर्गापूजा के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें कटिहार और आसपास के क्षेत्रों से लोग मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।





