सहरसा: सावन मास की पहली सोमवारी के साथ सोमवार, 3 अगस्त से मिथिलांचल की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से जुड़े मधुश्रावणी पर्व की शुरुआत हो गई है। यह पर्व विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है।
ब्रज किशोर ज्योतिष संस्थान एवं फाउंडेशन, डॉ. रहमान चौक, सहरसा के संस्थापक एवं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित तरुण झा ने बताया कि इस वर्ष सावन में कुल चार सोमवारी पड़ रही हैं। पहली सोमवारी से ही शिवालयों में भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व रहेगा। मंदिरों में हर-हर महादेव के जयघोष के साथ भक्तिमय वातावरण देखने को मिलेगा।
उन्होंने बताया कि मिथिलांचल में मधुश्रावणी पर्व की शुरुआत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से होती है और इसका समापन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को होता है। इस वर्ष यह पर्व 3 अगस्त से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलेगा।
पंडित तरुण झा के अनुसार, 15 दिनों तक चलने वाले इस पर्व के दौरान नवविवाहित महिलाएं प्रतिदिन बगीचों से फूल चुनकर माता विषहरा तथा भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
इस अवधि में दो दिनों तक नाग देवता की कथा तथा शेष दिनों में सावित्री-सत्यवान, शिव-पार्वती, राम-सीता और राधा-कृष्ण से जुड़ी धार्मिक कथाएं सुनाई जाती हैं। नवविवाहिताएं अपने मायके और ससुराल की पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए ससुराल से भेजे गए वस्त्र धारण करती हैं और वहीं से आए खाद्य पदार्थों का सेवन करती हैं।
संध्याकालीन पूजा में कोहबर और भगवती गीत गाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मधुश्रावणी व्रत पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है।





