गोड्डा के सरकंडा स्थित विवाह भवन में आदिवासी कुड़मि समाज का दो दिवसीय सेमिनार संपन्न हुआ। कार्यक्रम में केंद्रीय अध्यक्ष अजीत प्रसाद महतो ने भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने समुदाय को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और आगामी जनगणना में जनजाति एवं मातृभाषा की सही पहचान दर्ज कराने का आह्वान किया। इस दौरान संगठन का विस्तार भी किया गया।
कुड़मि समुदाय का दो दिवसीय सेमिनार संपन्न, भाषा-संस्कृति संरक्षण और अधिकारों पर हुई व्यापक चर्चा
गोड्डा। स्थानीय विवाह भवन, सरकंडा में आदिवासी कुड़मि समाज का दो दिवसीय सेमिनार सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम में झारखंड सहित पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार, भूटान सीमा क्षेत्र और राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। सेमिनार का मुख्य उद्देश्य कुड़मि समुदाय की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाना था।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आदिवासी कुड़मि समाज के केंद्रीय अध्यक्ष अजीत प्रसाद महतो का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय प्रवक्ता दीपक केसरिआर ने उन्हें माला पहनाकर सम्मानित किया। अपने संबोधन में अजीत प्रसाद महतो ने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और सभ्यता से होती है। यदि समुदाय अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित रखेगा, तभी वह अपने अधिकारों की लड़ाई मजबूती से लड़ सकेगा।
उन्होंने कहा कि कुड़मि समाज का सांस्कृतिक इतिहास समृद्ध रहा है और समुदाय के पारंपरिक पर्व-त्योहार उसकी पहचान हैं। उन्होंने लोगों से अपने पारंपरिक उत्सवों और रीति-रिवाजों को अपनाने तथा नई पीढ़ी को उनसे जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज को किसी के बहकावे में आने के बजाय अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करना होगा।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने समुदाय द्वारा किए गए विभिन्न आंदोलनों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता और संगठन की ताकत के बल पर समाज ने अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाया है। वक्ताओं ने विश्वास जताया कि आने वाले समय में कुड़मालि भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
सेमिनार के दौरान पीएचडी स्कॉलर ऋषि महतो ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वर्षों से समुदाय को उसके वास्तविक अधिकारों और पहचान से वंचित रखा गया है। उन्होंने आगामी जनगणना में समुदाय के लोगों से अपनी जनजातीय पहचान और मातृभाषा का सही विवरण दर्ज कराने की अपील की। उनका कहना था कि सही आंकड़ों के आधार पर ही समुदाय को उसकी वास्तविक सामाजिक और संवैधानिक पहचान मिल सकेगी।






