शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए साहसिक निर्णय राष्ट्रहित एवं छात्रहित में स्वागत योग्य : अश्विनी कुमार चौबे

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पटना: पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था से जुड़े निर्णय का स्वागत करते हुए इसे राष्ट्रहित और छात्रहित में उठाया गया साहसिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान छात्र राजनीति से निकले नेता हैं और हमेशा छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझने वाले जनप्रतिनिधि रहे हैं।

अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर लिया गया निर्णय भले ही कुछ देर से आया हो, लेकिन यह देश और छात्रों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने नीट सहित विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी अनियमितताओं पर रोक लगाने के लिए पहले ही कड़े कानून बनाने का निर्णय लिया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।

उन्होंने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्र आंदोलनों की आड़ में राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया। छात्रों की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय आंदोलन को हिंसात्मक बनाने की कोशिश की गई, लेकिन जनता विपक्ष की इस राजनीति को अच्छी तरह समझ चुकी है।

चौबे ने कहा कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। हर समस्या का समाधान संसद, संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र सर्वोपरि है और देशहित को हमेशा प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

अपने छात्र जीवन को याद करते हुए अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि उन्होंने 1966-67 के छात्र आंदोलन, 1974 के जेपी आंदोलन और आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया, जेल गए और अमानवीय यातनाएं भी झेलीं। उन्होंने कहा कि लाखों जेपी सेनानियों के संघर्ष और बलिदान के कारण ही देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई।

उन्होंने कहा कि 74 वर्ष की आयु में भी वे स्वयं को छात्र मानते हैं, क्योंकि छात्र होना केवल उम्र नहीं, बल्कि सीखने, संघर्ष करने और समाज के भविष्य के प्रति संवेदनशील रहने की भावना है। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर राजनीति नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और समाधान की आवश्यकता है। राष्ट्रहित और छात्रहित सर्वोपरि हैं तथा शिक्षा व्यवस्था को किसी भी प्रकार की राजनीति का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

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Author: kelanchaltimes

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