भागलपुर: महिला मंडल कारा, भागलपुर में महिला बंदियों के लिए ‘मंजूषा के रंगों से उम्मीदों की नई कहानी’ विषय पर दो दिवसीय कला कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यशाला भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), विदेश मंत्रालय, भारत सरकार के द्वारा आयोजित की गई है।
कार्यशाला का उद्घाटन ICCR के प्रतिनिधि, मंजूषा कला गुरु श्री मनोज पंडित, शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा, भागलपुर के जेल अधीक्षक, कला सांस्कृतिक पदाधिकारी श्री अंकित रंजन एवं महिला मंडल कारा, भागलपुर की जेल अधीक्षक द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य महिला बंदियों को अंग प्रदेश की समृद्ध पारंपरिक मंजूषा लोककला से जोड़ना तथा उनकी रचनात्मक प्रतिभा को सकारात्मक दिशा प्रदान करना है।
कार्यशाला के दौरान मंजूषा कला गुरु श्री मनोज पंडित द्वारा महिला बंदियों को मंजूषा चित्रकला की पारंपरिक शैली, प्रमुख प्रतीकों, आकृतियों एवं रंगों के प्रयोग की जानकारी दी जा रही है। इस अवसर पर मंजूषा कला की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तथा बिहुला-विषहरी की लोकगाथा से इसके गहरे संबंध के बारे में भी जानकारी दी गई।
महिला बंदियों ने कार्यशाला में उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए मंजूषा चित्रकला की बारीकियों को सीखा तथा रंगों और रेखाओं के माध्यम से अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त किया।
कार्यक्रम के दौरान महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने कहा कि कारा सुधार का उद्देश्य केवल सुरक्षा एवं अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि बंदियों के भीतर छिपी प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें रचनात्मक एवं सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कला के माध्यम से आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और नई उम्मीद का संचार होता है। महिला बंदियों को अंग प्रदेश की पारंपरिक मंजूषा कला से जोड़ना इसी दिशा में एक सार्थक पहल है।
वहीं, ICCR के प्रतिनिधि ने कहा कि भारतीय लोककलाएं देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे आयोजन पारंपरिक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मंजूषा कला गुरु श्री मनोज पंडित ने महिला बंदियों को मंजूषा कला की बारीकियों से अवगत कराते हुए कहा कि मंजूषा केवल चित्र बनाने की कला नहीं, बल्कि अंग प्रदेश की लोकसंस्कृति, आस्था, लोकगाथा और नारी शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली विशिष्ट कला परंपरा है।
दो दिवसीय यह कार्यशाला 8 एवं 9 अगस्त 2026 को आयोजित की जा रही है। कार्यशाला के माध्यम से महिला बंदियों को अपनी सृजनात्मक क्षमता को निखारने के साथ-साथ अपनी क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने और उसे आगे बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।





