सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : दहेज प्रताड़ना में अब फौरन गिरफ्तारी नहीं, 60 दिन “शांति अवधि” रहेगी

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नई दिल्ली: कई घरों में रिश्ते दहेज और घरेलू हिंसा के आरोपों की भट्ठी में झुलस जाते हैं। एक एफआईआर दर्ज होते ही परिवार के लोग थानों के चक्कर काटने लगते हैं। घर उजड़ जाता है, अदालतें सालों तक तारीखें देती रहती हैं। इन्हीं चिंताओं के बीच बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। अब दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस जल्दबाजी में गिरफ्तारी नहीं करेगी। दो महीने की “शांति अवधि” दी जाएगी। देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच एक महिला आईपीएस से जुड़े केस की सुनवाई करते हुए बुधवार को यह ऐतिहासिक आदेश सुनाया। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत दर्ज मामलों में पुलिस आरोपी पति या उसके परिवार को तुरंत गिरफ्तार न करे। अदालत ने यह आदेश एक महिला आईपीएस अधिकारी द्वारा अपने पति और ससुराल वालों पर दर्ज कराए गए केस की सुनवाई के दौरान दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 498ए के साथ दर्ज ऐसे ही अन्य धाराओं वाले केस भी इस दायरे में आएंगे, जिनमें सजा 10 साल से कम है और कोई गंभीर चोट पहुंचाने वाली धाराएं शामिल नहीं हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा की पीड़िताओं को न्याय मिलना जरूरी है, लेकिन कानून के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों की जिंदगी बर्बाद नहीं होनी चाहिए। दरअसल, 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों में एफआईआर के तुरंत बाद गिरफ्तारी न की जाए। हाई कोर्ट ने दो महीने की “शांति अवधि” का प्रावधान रखा था। इस दौरान केस परिवार कल्याण समिति को भेजा जाए, ताकि सुलह की कोशिश हो सके। अब सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा – “498ए का मकसद महिलाओं की सुरक्षा है, लेकिन कई बार इसका दुरुपयोग होता है। निर्दोष लोगों को फंसाया जाता है। ऐसे में गिरफ्तारी आखिरी विकल्प होनी चाहिए।” क्या बदलेगा? घरेलू हिंसा या दहेज प्रताड़ना केस में तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। एफआईआर के बाद दो महीने की “शांति अवधि” रहेगी। इस दौरान मामला जिला परिवार कल्याण समिति (FWC) को भेजा जाएगा। अगर सुलह नहीं होती, तभी पुलिस आगे बढ़ेगी। गिरफ्तारी से पहले FWC की रिपोर्ट देखी जाएगी।

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