हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक संजीव सिंह ने देश में एक देश-एक कानून की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विभिन्न सामाजिक और कानूनी व्यवस्थाओं के कारण समाज में विभाजन और वैचारिक मतभेद बढ़े हैं। संजीव सिंह ने आरोप लगाया कि जाति, वर्ग और भाषाई आधार पर भेदभाव की राजनीति ने सामाजिक एकता को प्रभावित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और समान कानून व्यवस्था की वकालत की।
राष्ट्रीय एकता के लिए एक देश-एक कानून की वकालत
हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक संजीव सिंह ने देश में एक समान कानून व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारत की एकता, अखंडता और मजबूती के लिए “एक देश-एक कानून” की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली में जारी अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि देश के समग्र विकास और सामाजिक समरसता के लिए समान अधिकार और समान कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।
सामाजिक विभाजन पर जताई चिंता
संजीव सिंह ने कहा कि आजादी के बाद से देश में विभिन्न स्तरों पर सामाजिक और वैचारिक विभाजन देखने को मिला है। उनके अनुसार, अलग-अलग वर्गों और समुदायों के लिए बनाई गई व्यवस्थाओं ने समाज में कई प्रकार के मतभेदों को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि समाज को एकजुट रखने के बजाय विभाजनकारी सोच को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
जातीय और वर्गीय राजनीति पर टिप्पणी
अपने बयान में उन्होंने कहा कि देश में जाति और वर्ग आधारित राजनीति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। उनका मानना है कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन और समान अवसर सुनिश्चित करने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी वर्गों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
भाषाई विविधता और एकता का मुद्दा
संजीव सिंह ने देश की भाषाई विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अनेक भाषाओं और संस्कृतियों का देश है। उन्होंने चिंता जताई कि कई बार भाषाई पहचान को लेकर विवाद और मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे सामाजिक दूरी बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि सभी भाषाएं और बोलियां भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं तथा इनके बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सम्मान और सहयोग का भाव होना चाहिए।
समान कानून व्यवस्था पर जोर
हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक ने कहा कि देश में समान कानून व्यवस्था लागू होने से नागरिकों के बीच समानता की भावना मजबूत होगी। उनके अनुसार, सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान जिम्मेदारियां राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूत कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि इस विषय पर व्यापक जनचर्चा और सकारात्मक संवाद की आवश्यकता है।
सामाजिक समरसता को बताया विकास का आधार
संजीव सिंह ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों की एकता और सामाजिक समरसता पर निर्भर करती है। यदि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग और विश्वास का वातावरण होगा तो विकास की गति भी तेज होगी। उन्होंने लोगों से सामाजिक मुद्दों को समझदारी और संवेदनशीलता के साथ देखने की अपील की।
राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का आह्वान
उन्होंने कहा कि देश के सभी नागरिकों को राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, सामाजिक सद्भाव, समान अवसर और राष्ट्रीय एकता ही भारत को मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाने का आधार बन सकते हैं।
विचार-विमर्श की आवश्यकता
संजीव सिंह ने अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि देश के भविष्य और सामाजिक एकता से जुड़े मुद्दों पर व्यापक संवाद होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों के बावजूद राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने के प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए।





