गोड्डा: मिथिला संस्कृति के प्रमुख मधुश्रावणी व्रत को लेकर गोड्डा के विभिन्न गांवों में उत्साह का माहौल है। 14 दिवसीय अनुष्ठान के छठे दिन नवविवाहिताएं श्रद्धा और भक्ति के साथ गज पर विराजमान माता गौरी, बाबा महादेव, नाग-नागिन सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा में लीन हैं। मधुश्रावणी व्रत में फूलों का विशेष महत्व माना जाता है। इस पर्व में नवविवाहिताएं एक-एक फूल चुनकर उनकी माला बनाती हैं और देवी-देवताओं को अर्पित करती हैं।
ससुराल में मधुश्रावणी पूजा कर रहीं शिवाक्षी सुमन उर्फ सानिया सीमा झा को उनके ससुर नरेंद्र झा सहित परिवार के सदस्यों का पूरा सहयोग मिल रहा है। उन्होंने बताया कि पूजा के दौरान गज-गौरी सहित सभी देवी-देवताओं का अभिषेक करने और उन्हें फूलों से ढंकने का विधान है। इसीलिए कमल, गुलाब, अढ़हुल, गुलदावदी, कनेल, तगड्ड सहित विभिन्न फूलों और बेलपत्र की व्यवस्था के लिए परिवार के लोग दूर-दूर से फूल मंगाने में जुटे हैं।
मधुश्रावणी पूजा के दौरान पारंपरिक देवी गीत, कथा और लोकोक्तियों से आसपास का वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। व्रती के साथ कथा सुनाने वाली महिलाएं और मोहल्ले-टोले की महिलाएं भी पारंपरिक गीतों में शामिल होकर अनुष्ठान में अपनी भागीदारी निभा रही हैं।
जानकारों के अनुसार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से मैथिल ब्राह्मण समाज की नवविवाहिताएं मधुश्रावणी व्रत के नियमों का पालन करते हुए पूजा करती हैं। नवविवाहिताएं अपने वैवाहिक जीवन के पहले सावन में यह व्रत करती हैं। मैथिल समाज में मधुश्रावणी का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
व्रत के दौरान मिट्टी एवं गोबर से विषहरा, शिव-पार्वती और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। प्रतिदिन कथा श्रवण, पारंपरिक अनुष्ठान और धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। मधुश्रावणी के माध्यम से नवविवाहिताएं अपनी धार्मिक आस्था और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ती हैं, वहीं मैथिल समाज की लोकपरंपराएं और लोकगीत भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।




