भागलपुर में ‘मंजूषा समर कैंप’ के अंतर्गत पांच दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, मंजूषा गुरु मनोज पंडित और शिक्षाविद राजीवकान्त मिश्रा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर इसकी शुरुआत की। ‘मंजूषा में नवाचार’ विषय पर आधारित इस कार्यशाला में 50 से अधिक प्रतिभागी अंग प्रदेश की इस लुप्तप्राय लोक कला को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ढालने और नए प्रयोग सीखने का प्रयास करेंगे।
परंपरा और आधुनिकता का संगम: भागलपुर में शुरू हुआ मंजूषा समर कैंप
भागलपुर की सांस्कृतिक पहचान ‘मंजूषा कला’ को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाने और इसे युवाओं से जोड़ने के उद्देश्य से एक भव्य प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला का आयोजन किया गया है। भागलपुर संग्रहालय, आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र और मंजूषा कला प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह समर कैंप 2 जून से 6 जून तक चलेगा। उद्घाटन समारोह में विशेषज्ञों ने इस कला के गौरवशाली इतिहास और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।
मंजूषा कला में नवाचार: समय की मांग
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने मंजूषा कला की तुलना चम्पा नदी के प्रवाह से की। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चम्पा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए उड़ाही की आवश्यकता है, उसी प्रकार मंजूषा कला को समय के साथ चलने के लिए ‘नवाचार’ की जरूरत है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह कार्यशाला इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।
शिक्षाविद राजीवकान्त मिश्रा ने इस बात पर जोर दिया कि मंजूषा कला को केवल चित्रों तक सीमित न रखकर इसे दैनिक जीवन की वस्तुओं जैसे टी-शर्ट, साड़ियों और टाई के डिजाइनों में शामिल किया जाना चाहिए। इससे कला को व्यावसायिक प्रोत्साहन मिलेगा और यह घर-घर तक पहुंचेगी।
मंजूषा गुरु की सीख: लोक गाथाओं से परे की सोच
मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम बिहूला-विषहरी की लोक गाथाओं से आगे बढ़कर समसामयिक विषयों पर भी मंजूषा कलाकृतियां बनाएं। उन्होंने बताया कि ‘साइकिल वितरण योजना’ पर आधारित मंजूषा चित्रों ने पहले ही राज्य स्तर पर ख्याति प्राप्त की है, और अब इसे राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
कार्यशाला में उत्साह और सीखने का जज्बा
कार्यशाला के पहले दिन निफ़्ट (NIFT) पटना के फैशन कम्यूनिकेशन के छात्र डाल ने प्रतिभागियों को मंजूषा की बारीकियों और रेखांकन के सूक्ष्म पहलुओं के बारे में शिक्षित किया। उद्घाटन के अवसर पर मनोज पंडित और प्रशिक्षण केंद्र की छात्राओं ने पारंपरिक लोक नृत्य प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
इस पांच दिवसीय कैंप में 50 से अधिक छात्र-छात्राओं ने पंजीकरण कराया है। ये प्रतिभागी मंजूषा कला में नए रंगों, नए विषयों और नई तकनीकों का प्रयोग कर इस प्राचीन लोक कला को आधुनिक स्वरूप देने का अभ्यास करेंगे।
भागलपुर में आयोजित यह मंजूषा समर कैंप केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि अंग प्रदेश की संस्कृति को सहेजने और उसे नई पीढ़ी के कंधों पर सौंपने का एक प्रयास है। यदि ये प्रयास निरंतर जारी रहे, तो निश्चित रूप से मंजूषा कला न केवल अपनी प्राचीन गरिमा को वापस प्राप्त करेगी, बल्कि विश्व के कला फलक पर भी मजबूती से अपनी छाप छोड़ेगी।





